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लघुकथा-

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– रूपेश कुमार सिंह

रूपेश कुमार सिंह

“तुम होते कौन हो मेरा हाथ रोकने वाले? क्या सारे समाज का ठेका लिया है तुमने? लेक्चर देना बहुत आसान होता है। कभी सामना किया है तुमने? कोई लड़की नहीं है न तुम्हारी, तुमने तो शादी भी नहीं की है, फिर तुम क्या जानो लड़कियों को झेलना क्या होता है। इसके पहले दो लड़कियां हुईं, मैंने इसे मारा तो क्या यह मर गयी? जो तीसरी बार लड़की पैदा करने पर, दो-चार थप्पड़ खाकर यह मर जायेगी?

अरे नातेदार, रिश्तेदार, समाज के लोगों को मुझे झेलना होता है, मुझे। जवाब मुझे देना होता है, मुझे।”

( लेकिन इस तरह डिलेवरी के बाद मारना ठीक है क्या? और यह बचाओ बचाओ चिल्ला भी रही थी, तभी मैंने हस्तक्षेप किया।)

“भैया! आप जाओ। यह हम दोनों के बीच का मसला है। जो भी है, जैसा भी है, है तो मेरा पति ही है।”

(उसने मुझसे नजरें फेरते हुए हमलावर पति की ओर मुस्कान बिखेर दी। जैसे मानों वो फिर से एक और बच्चा पैदा करने को तैयार है।)

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